Akash

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Wednesday, December 9, 2015

नफरत की बीज बोनेवालो, बाप समझ लो मोदी को !



नफरत भरी निगाहो से देखा है  तूने मोदी को !
दुनिया उसकी कायल हुई, अब बाप समझ लो मोदी को !!

ऐरा गेरा नत्थू खैरा सब भोक रहे हैं  मोदी को !
देश तरक्की राह  बढ़ा, अब बाप समझ लो मोदी को !!

छल कपट की भाषा छोड़ो ये रास ना आई मोदी को !
चाहे जितना दम लगा लो, पर बाप समझ लो मोदी को !!

कांग्रेसी मेडल जो पायी वापस कर दो मोदी को !
सूअरखोरी छोरो अब तुम, बाप समझ लो मोदी को !!

सेकुलर चोला छोड़ समझ लो अब तो दिल से  मोदी को !
बाप तो बाप ही होता है फिर भी बाप समझ लो मोदी को !!

आकाश कुमार 
+91-9461392392

Thursday, January 10, 2013

भावनाओं से भरी गगरी(घड़ा) - आकाश कुमार



देश के वीर जवानों को श्रधांजलि हेतु समर्पित। 
एक प्रयास मेरा भी -- भावनाओं की उधेड़ बुन से शब्द मिले, और सजा कर परोस दिया आप सभी के बिच। वर्तनी में अशुद्धियों के लिए माफ़ी चाहता हूँ। 
 पहली पंक्ति कांग्रेस सरकार के लिए है)
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सर फरोशी की तमन्ना, कब तुम्हारे दिल में थी ।
सर कटा और धड कटा, ये कैसी तेरी दिल्लगी ।।


अब हिमालय भी हिला है, जाग जाओ रणबाकुरों ।
नाप दो तलवार लेकर, पाक की पूरी जमीं  ।।

हर समय छला है तूने, ये ना हम भूले कभी  ।
आ जाओ तुम सामने से, सर कलम कर दूं अभी  ।।

जल रही है शोला बनकर, आज देश की दिशाएं ।
रो पड़ी है सर कटे की, अब भी जिन्दा आत्माएं ।।

बह गया है देश अब, नयनो  के नीर से ।
अब न मिल पाएंगे हम, अपने दो वीर से ।।

इन्तहां की हद कर दी, दोगली सरकार ने ।
सब दरिन्दे जुट गए है, देश की सरकार में ।।

डूब गया है देश शर्म से ,  पाक के हुंकार में ।
पुछ रहा आकाश भी अब , क्या किया सरकार ने ।।

मकसद न कोइ मेरी, सिर्फ आपको बताना है ।
इटली की सरकार हटाकर, मोदी को ही लाना है ।।
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फिर से नया भारत बनाना है ...  जय हिन्द ।


Saturday, May 12, 2012

क्या यही प्यार है ? - आकाश कुमार


क्या यही प्यार है ?
बड़ी सिद्दत से प्यार की दो बातें लिखी है | आपकी मंत्ब्य्यों की अपेक्छा है |

प्यार को किसी नाम की जरुरत नहीं होती |
इससे ज्यादा कोई चीज दुनियां में खुबसूरत नहीं होती ||
                  मैंने भी किया था प्यार बड़ी शान से |
                  पर ये क्या हुआ भी तो एक नादान से ||
प्यार की परिभाषा, ना प्यार का मतलब आता था |
मन ही मन उनकी हर अदा मेरे दिल को भाता था ||
                  उनकी हर अदा में छलकता प्यार देखा |
                  थोडा नहीं बेसुमार देखा ||
आगे देखो प्यार का खेला |
मधुर मिलन की आई बेला ||
                  प्यार का मौसम सावन आया |
                  दो से हमको एक बनाया ||
कई साल अब बीत गए |
हम वादों में जुट गए ||
                  दिन भर प्यार की कसमे खाना |
                  झूठ मुठ का रोना धोना ||
प्यार प्यार में तकरार हो गया |
देखते ही देखते साडी मेहनत बेकार हो गया ||
                  जिस प्यार को हमने सबकुछ माना |
                  उसी ने किया हमको बेगाना ||

Tuesday, January 31, 2012

अनकहे दिल की सौगात - आकाश कुमार



मेरे गुरु (संजय भास्कर जी )

मैंने जो कुछ भी लिखा पुरे दिल की गहराइयों से उसके लिए संजय भास्कर जी को धन्यवाद देना चाहता हूँ जो समय समय पे मेरा गुरु बनकर मार्ग प्रसस्त करते आ रहे हैं |
प्रिय संजय भास्कर जी आपकी बातों में आकर मैंने  अपनी जज्बातों को लिख दिया | अब आगे देखते है -----
प्यारे ब्लोग्वासी अगर आपको पसंद आये तो धन्यवाद नहीं आये तो भी धन्यवाद | - ऐसा मेरे गुरु (संजय भास्कर जी ) ने सिखाया |


न जाने कौन सी बात  पे वो हो गई खफा |
क्यों बन गया मैं उनके नज़रों में बेवफा ||
अक्सर मैं रोता हूँ याद करके उनकी बातों को |
कैसे मिटा दूं अपने दिल से दी हुई उनकी सौगातों को ||

                   चुप्पी हुई क़दमों से आना धीरे से मेरी कानों में फुसफुसाना |
                   अकेले में देखकर मुस्कुराना सहेलियों के बिच शर्मना ||
                    आज भी भुला नहीं पाता हूँ उन अकेली मुलाकातों को |
                    कैसे मिटा दूं अपने दिल से दी हुई उनकी सौगातों को ||

समय बदला, युग बदला, बदल गया जमाना |
इस प्यार को भुलाने का क्या क्या करूँ बहाना ||
दिन कट जाती है पर सो नहीं पाता रातों को |
कैसे मिटा दूं अपने दिल से दी हुई उनकी सौगातों को ||

                  छुपा कर रखता था उनकी तस्वीर किताबों में |
                  दिल की बात दिल में रखकर खोया उनकी यादों में ||
                  जब मैं मिलता उनसे चूमता प्यारी हाथों को |
                  कैसे मिटा दूं अपने दिल से दी हुई उनकी सौगातों को ||

तू सावन की रानी मैं भादो का राजकुमार |
प्यार का गाथा कोई न जाने इसकी लीला अपरम्पार ||
तू सावन में जन्मी मैं कृष्ण पक्छ (अस्ठ्मी) की रातों को |
कैसे मिटा दूं अपने दिल से दी हुई उनकी सौगातों को ||

Sunday, January 15, 2012

माँ और मेरे अरमान - आकाश सिंह

प्रिय ब्लोग्वाशी आपसभी को आकाश कुमार का प्यार भरा नमस्कार | संजय भास्कर जी की प्रेरणा और "दर्शन कौर धनोये" जी की ममता ने आख़िरकार वापस बुला ही लिया |
दर्शन जी जिन्हें मैं माँ कहता हूँ उनके बारे में जो कुछ भी लिखा जाये मेरे समझ से कम होगा | एक प्रयाश मेरा भी | अपनी बातों को मैंने निचे लिख दिया अब आपकी बारी है |

"दर्शन कौर धनोये" जी

एक अजनबी राहों पर


चल पड़ा अकेले


चंद मुठ्ठी भर लोकप्रियता के लिए
राह अजनबी राही अजनबी
जो भी आया जो भी गया 
पर सब के सब अजनबी 
उस भीड़ में तलाशती हुई मेरी निगाहें
टकटकी लगाये बैठी है
कब पुरे होंगे मेरे अरमान और सपने
पर पता नहीं 
एक पथिक से पूछा ये रास्ता कहाँ जाती है
आपकी सोंच तक
मैंने सोंचा पागल है 
फिर माँ की याद आई 
क्या ये रास्ता मेरी माँ तक जाएगी 
नहीं ऐसा नहीं हो सकता 
मन की उधेड़ बिन के बिच 
जिन्हें मैं माँ कहता हूँ
एक राही का पैगाम आया 
ये क्या इन्हें तो मैं जानता तक नहीं 
फिर अपनापन सा क्यों लग रहा 
ममता भरी पैगाम पढ़कर 
मेरे जुबान पे एक ही शब्द आया "माँ" 
और पुरे हुए "मेरे अरमान , मेरे सपने" |

Monday, September 26, 2011

दुल्हन........ - आकाश सिंह

गम और खुशी जिंदगी के ऐसे दो धागे हैं जिनके ताने बाने के बगैर जिंदगी की चादर नहीं बुनी जा सकती |
 
फूलों से क्यों मोहब्बत है तितलियाँ समझती हैं |
        माँ के दिल में क्या गम है बेटियां समझती हैं ||


रुखसती की तन्हाई गूंजती है आँगन में |
        दुल्हनों के आंसू को सहेलियां समझती हैं ||


तोड़कर मसलते हैं जो नर्म नर्म फूलों को |
        दर्द किसको कहते हैं डालियाँ  समझती हैं ||


मरघटों में आती  है रोज एक नई दुल्हन |
        किस तरह जली होगी अर्थियां समझती हैं ||

Wednesday, June 15, 2011

सवाल ? - आकाश सिंह

प्रिय साथियों मैं पिछले कुछ दिनों से ब्लोगिंग की दुनिया से बेखबर था इसके लिए आप सभी से माफ़ी चाहता हूँ| एक नई प्रस्तुति के साथ आकाश कुमार का प्यार भरा नमस्कार स्वीकार करें|
सवाल ?
दौलत के बाजार में नीलाम हुए लड़के,
बेटी वाले कैसे ख़रीदे भाव बहुत है बढे हुए ?
दस-बीस, साठ-सत्तर से लाखों पर आ पहुंचे हैं |
हाय कितने बेबस हैं वे जो खुद को बेच रहे हैं |
शायद उपर उठने का प्रयास कर रहे हैं |
तभी तो दुल्हन के रूप में खजाने की चाभी ढूंढ रहे हैं |
नहीं अब बिकेंगे नहीं अब खरीदेंगे...
हम पशु नही इन्सान हैं |

Monday, April 25, 2011

आगाज और अंजाम ! - आकाश सिंह

मेरे पैदा होने की खबर
जब बाप की कानो में पड़ी
तो उनका चेहरा उतर गया
भविष्य का सपना बिखर गया
क्योंकि मैं लड़की थी
घर का माहौल यूं हो गया
जैसे पैदाइश नहीं
कोई मौत हुई है
माँ को भी
लाल के आने का पूरा भरोसा था
मैं लाल नहीं, लाली थी
इशलिये माँ ने भी जी भर कर कोसा था
फिर मुझे बेमन से पाला पोसा गया
मेरे सामने
भाई का जूठन परोसा गया
मैं अपने ही घर में
अजनबी बनकर जीती रही
फिर भी माँ-बाप से मुझे
कोई शिकायत न थी
क्योंकि मैं जानती हूँ
औरत की जिंदगी,
मर्द के आज्ञा पालन में ही कट जाती है |

Tuesday, April 12, 2011

का कहीं देशवा के हाल भईया कहलो ना जाता ?

ये कविता भोजपुरी में खासकर बिहार और झारखण्ड में हो रही परीक्छा को लेकर लिखी गई है |
इन दिनों पुरे देश में सरकारी स्कूल और कालेजों की परीक्छा जोर शोर से हो रही है मेरे मन में एक विचार आया जो मैंने लिख दिया अब आप भी अपना बहुमूल्य विचार दे ही दीजिये| 
जरा सोंचिये पीछे की खिड़की के बारे में...

का कहीं.. का कहीं देशवा के हाल भईया कहलो ना जाता ?
एम. ए. बी. ए. पास कइलन तनको ना बुझाता
का कहीं.. का कहीं देशवा के हाल भईया कहलो ना जाता ?

चीट पर फिट  होके सीट पर लिखाता
मैट्रिक, इंटर क्लास के परीक्छा दियाता
एगो जालन लिखे दुगो लागल जालन पीछे
का कहीं.. का कहीं देशवा के हाल भईया कहलो ना जाता ?

घुश चपरासी से पुलिस के पैसा दियाता
एकरा पर सरकार के तनको न बुझाता
का कहीं.. का कहीं देशवा के हाल भईया कहलो ना जाता ?

टीचर ट्रेनिंग के लोग मास्टर कहता
तेरह दिन में तिन दिन पढावे लोगन जाता
का कहीं.. का कहीं देशवा के हाल भईया कहलो ना जाता ?

रोज-रोज नया-नया स्कूल, कॉलेज खुलल जाता
एकरा में पढावे वाला भूखे मरल जाता
का कहीं.. का कहीं देशवा के हाल भईया कहलो ना जाता ?