Akash

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Saturday, May 12, 2012

क्या यही प्यार है ? - आकाश कुमार


क्या यही प्यार है ?
बड़ी सिद्दत से प्यार की दो बातें लिखी है | आपकी मंत्ब्य्यों की अपेक्छा है |

प्यार को किसी नाम की जरुरत नहीं होती |
इससे ज्यादा कोई चीज दुनियां में खुबसूरत नहीं होती ||
                  मैंने भी किया था प्यार बड़ी शान से |
                  पर ये क्या हुआ भी तो एक नादान से ||
प्यार की परिभाषा, ना प्यार का मतलब आता था |
मन ही मन उनकी हर अदा मेरे दिल को भाता था ||
                  उनकी हर अदा में छलकता प्यार देखा |
                  थोडा नहीं बेसुमार देखा ||
आगे देखो प्यार का खेला |
मधुर मिलन की आई बेला ||
                  प्यार का मौसम सावन आया |
                  दो से हमको एक बनाया ||
कई साल अब बीत गए |
हम वादों में जुट गए ||
                  दिन भर प्यार की कसमे खाना |
                  झूठ मुठ का रोना धोना ||
प्यार प्यार में तकरार हो गया |
देखते ही देखते साडी मेहनत बेकार हो गया ||
                  जिस प्यार को हमने सबकुछ माना |
                  उसी ने किया हमको बेगाना ||

Tuesday, January 31, 2012

अनकहे दिल की सौगात - आकाश कुमार



मेरे गुरु (संजय भास्कर जी )

मैंने जो कुछ भी लिखा पुरे दिल की गहराइयों से उसके लिए संजय भास्कर जी को धन्यवाद देना चाहता हूँ जो समय समय पे मेरा गुरु बनकर मार्ग प्रसस्त करते आ रहे हैं |
प्रिय संजय भास्कर जी आपकी बातों में आकर मैंने  अपनी जज्बातों को लिख दिया | अब आगे देखते है -----
प्यारे ब्लोग्वासी अगर आपको पसंद आये तो धन्यवाद नहीं आये तो भी धन्यवाद | - ऐसा मेरे गुरु (संजय भास्कर जी ) ने सिखाया |


न जाने कौन सी बात  पे वो हो गई खफा |
क्यों बन गया मैं उनके नज़रों में बेवफा ||
अक्सर मैं रोता हूँ याद करके उनकी बातों को |
कैसे मिटा दूं अपने दिल से दी हुई उनकी सौगातों को ||

                   चुप्पी हुई क़दमों से आना धीरे से मेरी कानों में फुसफुसाना |
                   अकेले में देखकर मुस्कुराना सहेलियों के बिच शर्मना ||
                    आज भी भुला नहीं पाता हूँ उन अकेली मुलाकातों को |
                    कैसे मिटा दूं अपने दिल से दी हुई उनकी सौगातों को ||

समय बदला, युग बदला, बदल गया जमाना |
इस प्यार को भुलाने का क्या क्या करूँ बहाना ||
दिन कट जाती है पर सो नहीं पाता रातों को |
कैसे मिटा दूं अपने दिल से दी हुई उनकी सौगातों को ||

                  छुपा कर रखता था उनकी तस्वीर किताबों में |
                  दिल की बात दिल में रखकर खोया उनकी यादों में ||
                  जब मैं मिलता उनसे चूमता प्यारी हाथों को |
                  कैसे मिटा दूं अपने दिल से दी हुई उनकी सौगातों को ||

तू सावन की रानी मैं भादो का राजकुमार |
प्यार का गाथा कोई न जाने इसकी लीला अपरम्पार ||
तू सावन में जन्मी मैं कृष्ण पक्छ (अस्ठ्मी) की रातों को |
कैसे मिटा दूं अपने दिल से दी हुई उनकी सौगातों को ||

Sunday, January 15, 2012

माँ और मेरे अरमान - आकाश सिंह

प्रिय ब्लोग्वाशी आपसभी को आकाश कुमार का प्यार भरा नमस्कार | संजय भास्कर जी की प्रेरणा और "दर्शन कौर धनोये" जी की ममता ने आख़िरकार वापस बुला ही लिया |
दर्शन जी जिन्हें मैं माँ कहता हूँ उनके बारे में जो कुछ भी लिखा जाये मेरे समझ से कम होगा | एक प्रयाश मेरा भी | अपनी बातों को मैंने निचे लिख दिया अब आपकी बारी है |

"दर्शन कौर धनोये" जी

एक अजनबी राहों पर


चल पड़ा अकेले


चंद मुठ्ठी भर लोकप्रियता के लिए
राह अजनबी राही अजनबी
जो भी आया जो भी गया 
पर सब के सब अजनबी 
उस भीड़ में तलाशती हुई मेरी निगाहें
टकटकी लगाये बैठी है
कब पुरे होंगे मेरे अरमान और सपने
पर पता नहीं 
एक पथिक से पूछा ये रास्ता कहाँ जाती है
आपकी सोंच तक
मैंने सोंचा पागल है 
फिर माँ की याद आई 
क्या ये रास्ता मेरी माँ तक जाएगी 
नहीं ऐसा नहीं हो सकता 
मन की उधेड़ बिन के बिच 
जिन्हें मैं माँ कहता हूँ
एक राही का पैगाम आया 
ये क्या इन्हें तो मैं जानता तक नहीं 
फिर अपनापन सा क्यों लग रहा 
ममता भरी पैगाम पढ़कर 
मेरे जुबान पे एक ही शब्द आया "माँ" 
और पुरे हुए "मेरे अरमान , मेरे सपने" |